Friday, 18 November 2016

"ऑल इंडिया सोशल मीडिया फोरम" का गठन

समाज कल्याण को तीव्र गति देने की दिशा में सोशल मीडिया एडमिन्स एवं यूर्जस के कल्याणार्थ सोशल मीडिया शक्तिकरण के उद्देश्य से लेखकों, पत्रकारों, समाज सेवकों, फिल्म निर्माता - निर्देशकों एवं एडवोकेट्स ने मिलकर किया "सोशल मीडिया फोरम" का गठन

जयपुर। सोशल मीडिया के असंख्य लाभ हैं किंतु इससे कुछ हानियां भी सामने आई है, बड़ी संख्या में लोग इससे लाभ प्राप्त कर रहे है, किन्तु कुछ लोग इसका दुरुपयोग भी कर रहे है, जो अत्यंत अनुचित है। ऐसे कुछ लोगों की वजह से आपस में एक दूसरे तक अत्यंत सरलता, सहजता एवं मितव्ययता से उपयोगी जानकारियों एवं सूचनाओं को एक दूसरे तक पहुँचाने वाले, विभिन्न जाति, वर्ग के लोगों को आपस में जोड़ने वाले इस महत्वपूर्ण साधन पर रोक, आंशिक रोक, अंकुश तक की बात कई बार सुनने में आती रही है। जबकि इस पर किसी भी प्रकार की रोक के स्थान पर इसके उपयोगकर्ताओं के लिए इसे सही ढंग से जानने या उनके लिए प्रशिक्षण, वर्कशॉप, जागरूकता कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे इस साधन का दुरूपयोग करने वालों से स्वयं भी बचा जा सके और दूसरों को भी बचाया जा सके एवं इस सुलभ साधन द्वारा लाभ ही लाभ हों, हानियां न हो।
विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाने में अग्रसर इस साधन से विभिन्न रचनात्मक एवं सामाजिक कार्यक्रमों को मितव्ययी एवं सहजता से अधिकाधिक गति मिले, इसके लिए सोशल मीडिया वेलफेयर की आवश्यकता को महसूस करते हुए उक्त विचारो के साथ इस दिशा में विगत काफी समय से सकारात्मक एवं रचनात्मक प्रयास करते हुए सोशल लीडर एवं सीनियर जर्नलिस्ट महावीर कुमार सोनी द्वारा एक और बड़े प्रयास के रूप में बुलाई गई बैठक में फेसबुक एडमिन्स, व्हाट्स एप्प ग्रुप्स एडमिन्स, पत्रकार, लेखक, एडवोकेट्स आदि ने उपस्थित होकर सोशल मीडिया सशक्तिकरण के प्रयास में कंधे से कंधे मिलाकर साथ देने का वायदा किया। वक्ताओं ने अपने अपने विचारों में सोनी के उक्त उदगारों का समर्थन किया। वक्ताओं ने अपने अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि आम लोगों के विभिन्न बड़े संकटों एवं समस्याओं का इससे त्वरित समाधान हुआ है, भविष्य में राज्य एवं जनहितकारी कार्यक्रमों को इससे त्वरित गति देने के लिए सोशल मीडिया के शक्तिकरण एवं कल्याण की आवश्यकता है। जिसके मद्देनजर सबने समर्थन करते हुए सर्वसम्मति से एक मंच गठित करने की आवश्यकता बतलाई, उपस्थित लोगों ने आपस में चर्चा कर सर्व सम्मति से इसके लिए "ऑल इंडिया सोशल मीडिया फोरम" के नाम से मंच गठन करने पर मोहर लगाई। इसके बाद प्रस्ताव पारित कर इस मंच के लिए सर्वसम्मति से अध्यक्ष के रूप में श्री महावीर कुमार सोनी को चुना गया। उपस्थित सभी लोगों ने इसकी कार्यकारिणी में शामिल होकर जो जिम्मेदारी संघ अध्यक्ष देंगे, उसको निभाने का वायदा किया, शपथ ली। इसके बाद अध्यक्ष महोदय द्वारा निम्नानुसार लेखक गण, पत्रकार, फिल्म निर्माता, फिल्म निर्देशक, समाजसेवी, रंगमंच कर्मी, एडवोकेट्स आदि में से संस्थापक सदस्यों की प्रथम कार्यकारिणी निम्नानुसार घोषित की गई :-
1. श्री महावीर कुमार सोनी
2. श्री इंदरजीत शर्मा
3. श्री तपन भट्ट
4. श्री अबरार अहमद
5. श्री अविनाश त्रिपाठी
6. श्री वीरेंद्र गोदीका, एडवोकेट
7. श्रीमती ललिता महरवाल, एडवोकेट
8. श्री अकबर खान
9. श्रीमती पूजा पवन कुमार
10. श्री अक्षय जैन, मोदी
11. श्रीमती मीनाक्षी माथुर
12. श्री महेंद्र सोनी
13., श्री दीपक दाधीच
14. श्री प्रवीण जाखड़
15. श्रीमती रेनू शर्मा
16. श्री श्रवण मेहरड़ा
16. श्री चोथमल बघेरिया
17. शुभम शर्मा
18. हरि प्रसाद शर्मा
19. डॉ. टीना जैन
20. वी पी हलचल
21. डॉ. सुभाष यादव
22. बनवारी यादव
23. मनीष जैसलमेरिया
24. मनोज भारद्वाज







Saturday, 23 July 2016

पर्यावरण को कैसे मिले बड़ी गति, अध्यात्म एवं ध्यान की सिद्धि के लिए भी भारत की प्राचीन पर्यावरणीय व्यवस्था को पुनः स्थापित करने को मूलभूत आवश्यकता मानते हुए पूरा करने पर शीघ्र ध्यान देने की आवश्यकता - ज्योतिर्विद महावीर कुमार सोनी

तमाम भौतिक सुख सुविधाओं के बावजूद आज मनुष्य अपने आपको अत्यंत अशांत महसूस कर रहा है, यूं कहना चाहिए कि  जैसे जैसे हमने भौतिक सुख साधन जुटाएं हैं, हमने हमारी मन की शान्ति खो दी है। कोई कहे कि मैं यह कैसे कह रहा हूँ कि मनुष्य अपने आपको अशांत महसूस कर रहा है, इसके जवाब में मेरा तर्क होगा कि आज जगह जगह ध्यान केंद्र चल रहे हैं, मेडिटेशन सेंटर चल रहे हैं, लोगों की बेतहाशा भीड़ उनमें अपनी शान्ति खोज कर रही है, यह इसी  बात का प्रमाण है।   विदेशी लोग जिस शांति को भारत की मंत्र, योग, प्रार्थना एवं विभिन्न आध्यात्मिक आहार विहार की साधनाओं एवं क्रियाओं द्वारा प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं हम विगत दशकों में इनसे दूर पर दूर हुए हैं ।  कई सालों से मेरा इस बारे में चिंतन मनन चलता रहा है,  मेरे मस्तिष्क में बहुत सारी बाते आती जाती रही है, नए नए विचार आए हैं, जिनके परिप्रेक्ष्य में  कुछ को मैं यहाँ शेयर करने जा रहा हूँ. हमारा भारत ध्यान एवं विशिष्ट विद्याओं का मुख्य केंद्र हुआ करता था, इसका एक मुख्य कारण हमारे ऋषि मुनि का ध्यान में तल्लीन हो जाना, ध्यान की सिद्धि प्राप्त हो जाना, जो अब दूर हो गई है। ध्यान की सिद्धि से त्रि -नेत्र खुलना सम्भव होना, टेलीपैथी जैसी योग्यताएं प्राप्त होना सम्भव था। ध्यान की सिद्धि के लिए जो वातावरण एवं परिस्थितियाँ  हमारे देश में ज्यादा रूप में सुलभ तरीके से उपलब्ध होती  थी वो अन्यत्र कम थी। हमारे देश की आध्यात्मिक व्यवस्था के अनुसार आयु के अंतिम वर्षों में संन्यास ले लेना या संन्यास के तुल्य जैसा जीवन बिताना शामिल था, अर्थात राग, द्वेष, मोह को बिलकुल छोड़ना या कम करना, आत्मा के कल्याण की तरफ ध्यान देना शामिल था, जो कि जंगलों एवं निर्जन पर्वतों पर ही सम्भव थी। भौतिक विकास करने की तरफ ध्यान देने में हम हमारी इस मूलभूत आवश्यकता को भूल से गए हैं। आज का मेरा यह लेख इसी मूल आवश्यकता को पूरा करने या कराने के तरफ ध्यान दिए जाने पर केंद्रित है, जिसको यदि पूरा किया जावे तो पर्यावरण सरंक्षण को तो बढ़ावा मिलेगा ही, साथ ही साथ पर्यावरणीय विषमताओं के कारण हो रही बीमारियों एवं विभिन्न कष्टों को रोकने की दिशा में भी गति सम्भव होगी। मेरे विचार से हम जिस नगर उप नगर में रहते हैं, उसके बाहर भी बड़े क्षेत्र को घेरे हुए इस तरह के जंगल होने चाहिए, जिनको यहाँ  जंगल तो विषय की स्पष्टता दर्शाने की दृष्टि से कहा जा रहा है, मेरा अभिप्राय: घने विशाल पेड़ पौधों, नदी नालों कंकर पत्थर युक्त  शिला आदि लिए हुए बड़े स्थान उपलब्ध होने से है, अर्थात जंगल जैसा दिखने वाला ऐसा वातावरण हो, जिसमें खतरनाक किस्म के जानवरों को छोड़कर सब तरह के जानवर (पशु - पक्षी)  भी जीवन यापन कर सकें। विभिन्न जाती - प्रजाति के पशु पक्षियों का पर्यावरणीय संतुलन बनाने में बड़ा योगदान होता है, इनका धीरे धीरे लुप्त हो जाना पर्यावरणीय विषमता को बढ़ाने का एक बहुत बड़ा कारण है। स्वन्त्रता सभी को प्रिय होती है, पशु पक्षी को भी स्वन्त्रता उतनी ही अच्छी लगती है जितनी हमें । हम इनको बन्धन में रखकर बचाना चाहते हैं, जो सम्भव नहीं है, किसी जाती -  प्रजाति को बंधन में रखते हुए हम बढ़ाना चाहें,  सम्भव नहीं है । आज सभी लुप्त होती जा रही पशुओं की विभिन्न प्रजातियों को बचाना चाहते हैं और बढ़ाना चाहते हैं  यह तभी सम्भव है जब हम इन्हें स्वन्त्रता पूर्वक विचरण करने वाला वातावरण दे सकें, तभी लुप्त होती जा रही प्रजातियों को बचाना सम्भव है, उक्त दृष्टि से भी उक्त पर्यावरणीय वातावरण बनाना आवश्यक है, यदि सम्भव बन सके तो ऐसे पर्यावरणीय वातावरण युक्त बड़े स्थान को सभी तरह की तरंगो, बिजली आदि के विभिन्न प्रभावों से मुक्त भी रखा जावे।
आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में मैं उक्त स्थान पर कोई जंगल स्थापित  होने की बात करूँ तो आपको बड़ी अटपटी या बेहूदी लगेगी, केवल विषय की स्पष्टता की दृष्टि से मैं यहाँ जंगल शब्द प्रयोंग कर रहा हूँ। यद्यपि हमारी सरकार का ध्यान पर्यावरण संतुलन को लेकर विगत वर्षों में काफी गया है जिसके तहत हर कॉलोनी में आज बगीचे अनिवार्य रूप से बनाए जा रहे हैं, मेरा मानना है यह पर्याप्त नहीं है, हमारे विभिन्न कष्टों एवं बीमारियों का निवारण करने के लिए हमें हमारी कुछ पुरानी व्यवस्थाओं में आधुनिक परिस्थितियों से तालमेल बैठाते हुए लौटना होगा। मेरे चिंतन में स्पष्टत:  यह बात आई है कि विभिन्न तरह के जाति प्रजाति के पशु पक्षी पर्यावरणीय संतुलन को बनाने का काम करते हैं, नदी का जो पानी पेड़ पौधों पर गुजरते हुए विभिन्न तरह के कंकर पत्थरों से टकराते हुए पीने के काम आता था, वो विशेष शक्ति युक्त हुआ करता था, इन सब का हमने अभाव ही कर ही दिया है।  हम ध्यान की सिद्धि चाहते हैं वो ऐसे शांत वातावरण में ही सम्भव है, जहाँ टेलीफोन, मोबाइल, टी वी आदि की तरंगो का अभाव हो,  जहाँ पूर्णतः प्राकृतिक वातावरण हो, जहाँ शान्ति हो, उसी वातावरण में ध्यान आदि की  सिद्धि सम्भव है, हमने बिना सोचे समझे बेतहाशा रूप में जंगल के जंगल काट दिए, वो जंगल, खेत अब वापिस नहीं ला जा सकते और न ही आज के चकाचौंध भरे वातावरण मेरी मांग का कोई समर्थन करने आगे आएगा। जब एक तरफ दूर दूर तक आवासीय  कालोनियां  बसाई जा रही है, शहर के बाहर की जगह की कीमतें करोड़ों को छू रही है, मेरी बात बहुतों को हास्यापद ही लगेगी, किन्तु मैं फिर भी अपना चिंतन सामने रख रहा हूँ, मैं मेरे उक्त विचार को आज की सबसे मूल भूत आवश्यकता के रूप में  सामने रख रहा हूँ। एक समय था जब आदमी अशांति महसूस करता था या उसे वैराग्य हो जाता था, उसको संन्यास की आवश्यकता महसूस होती तो  वो वन को गमन कर जाता था। आज वन नहीं है, बाग़ बगीचें भी आसपास बना दो तो भी ध्यान एवं समाधि का वन जैसा वातावरण वे नहीं दे सकते, जिसके कि अभाव में हमारे ऋषि मुनि वो सिद्धियां या आश्चर्यजनक बातें सामने लाने में सामर्थ्यशील भी नहीं हो सकते, हमारे आसपास विचारों के साथ विभिन्न तरह तरंगो का व्यापक जाल है, प्रदूषित वातावरण है, जिसमें ध्यान की पूर्ण सिद्धि सम्भव नहीं है। हमारे आध्यात्मिक गुरु जन पहले जैसी ऋद्धियाँ प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं, उनमें यह भी एक बड़ा कारण है, जिसमें  वन जैसी  उपयुक्त जगह का अभाव होना है। हम जो पर्यावरण को गति दे रहे हैं वह पर्याप्त नहीं है, सृष्टि की रक्षा, पर्यावरणीय संतुलन के लिए उक्त बातों पर विचार आज पहली बड़ी जरुरत होनी चाहिए। विषम होते जा रहे वातावरण में पर्यावरण सरंक्षण को सबसे बड़ा कर्त्तव्य घोषित किया जाना चाहिए, उक्त के अलावा भी जहाँ भी सम्भव हो पर्यावरण बढ़ाने से सम्बंधित कार्य करने वाले को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हमने देखा है कि विदेशी राष्ट्रों में हमारी विद्याओं/आध्यात्मिक शक्तियों की तरफ समय समय पर ध्यान गया है, उनमे इन सबको लेकर शोध एवं अनुसंधान की तरफ विशेष जिज्ञासा है और तुरंत पहल करने की रूचि भी है, वे उक्त  दिशा में पहले पहल करें, इससे पूर्व हमें इस दिशा में पहल करनी चाहिए,क्योंकि एक इस तरफ बड़ी पहल करने पर पर्यावरण को ज्यादा शीघ्रता से बढ़ा पाएंगे, पशु पक्षी की विभिन्न जाति - प्रजाति को सरंक्षित करने की दिशा में आगे बढ़ते हुए इनके द्वारा होने वाले पर्यावरणीय संतुलन को स्थापित करने में गति कर पाएंगे, हमारे भारतीय जीवन का  जो एक मूलभूत तत्व या उद्देश्य है जिसके तहत हम या हमारे ऋषि मुनि ध्यान साधना के लिए कोई उपयुक्त स्थान/वातावरण पा सकें, उसको पूरा करने में सफल हो पाएंगे। इसके अलावा अनगिनत प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष  ऐसे विभिन्न लाभ जिनसे हम सब में से प्राय :कर सब वाकिफ हैं, को पाने के दिशा में गति  दे पाएंगे।
 
नोट: यह लेख महावीर  कुमार सोनी के चिंतन मनन पर आधारित उनका मूल लेख है, आप इसे कहीं भी पुनः प्रकाशित कर सकते है, बेबसाइट, बेब पोर्टल आदि में दे सकते हैं, किन्तु देते समय लेखक का नाम आवश्यक रूप से दें. पसंद आया हो तो पर्यावरणीय हित में ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

राजस्थान सरकार की आमजन के लिए विभिन्न सहायता योजनाएँ

इस संसार में परोपकार करने की भावना लगभग हर व्यक्ति में होती है। हमारे अपने भीतर भी ऎसे विचार आते हैं किंतु सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण हम प्रायः जीवन में दो-चार हजार रुपये की चैरिटी करके आत्मसंतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं किंतु एक ऎसा तरीका भी है जिसके माध्यम से हम अपने पास-पड़ौस में रहने वाले अथवा अपने घर में काम करने वाले किसी निर्धन व्यक्ति या परिवार को इतनी आर्थिक मदद पहुंचा सकते हैं कि उस परिवार का पूरा भविष्य ही बदल जाये। इस कार्य में हमारी जेब से कोई रुपया खर्च नहीं होगा, राजस्थान सरकार के बहुत से ऎसे विभाग हमारे इस पुण्य कार्य के लिये रुपया खर्च करने को तैयार हैं।       राजस्थान सरकार ने वर्तमान में विभिन्न विभागों के माध्यम से एक सौ से अधिक ऎसी योजनाएं चला रखी हैं जिनके माध्यम से आप गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता दिलवा सकते हैं। झालावाड़ जिला कलक्टर डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी ने इन योजनाओं में से 89 ऎसी योजनाएं चुनकर एक पुस्तिका तैयार करवाई है जो पूरी तरह से जन्मजात कन्याओं से लेकर, स्कूली बालिकाओं, प्रौढ़ महिलाओं, विधवाओं, एकल महिलाओं, परित्यक्ताओं तथा वृद्धाओं के लिये समर्पित हैं। इनमें से 40 योजनाएं प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभागों के माध्यम से, 28 योजनाएं सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग के माध्यम से,15 योजनाएं श्रम कल्याण विभाग के माध्यम से, 3 योजनाएं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से तथा 3 योजनाएं महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से संचालित की जाती हैं। मैं यहां केवल तीन बड़ी योजनाओं की चर्चा कर रहा हूँ जिनका लाभ आप किसी गरीब परिवार को तुरंत दिलवा सकते हैं। वह परिवार जीवन भर आपका अहसानमंद रहेगा। राजश्री योजना राजस्थान सरकार ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से 1 जून 2016 से राजश्री योजना आरम्भ की है। इस योजना में किसी महिला को चिकित्सा संस्थान में पुत्री को जन्म देने पर तुरंत 2500 रुपये दिये जाते हैं। बालिका के जन्म की प्रथम वर्षगांठ पर पुनः 2500 रुपये दिये जाते हैं। जब बालिका किसी सरकारी स्कूल में कक्षा 1 में प्रवेश लेती है तो उसे 4000 रुपये दिये जाते हैं। बालिका द्वारा कक्षा 5 में प्रवेश लेने पर 5000 रुपये, कक्षा 10 में प्रवेश लेने पर 11 हजार रुपये तथा कक्षा 12 उत्तीर्ण करने पर 25 हजार रुपये की राशि बालिका की मां को दी जाती है। इस प्रकार एक बालिका के पालन-पोषण के लिये उसकी मां को पचास हजार रुपये दिये जाते हैं। एक माता को यह सहायता दो बालिकाओं तक के लिये दी जा सकती है। इस बालिका को जननी शिशु सुरक्षा योजना के अंतर्गत मिलने वाले 1400 रुपये (ग्रामीण क्षेत्र में) अथवा 1000 रुपये (नगरीय क्षेत्र में) अलग से मिलेंगे तथा अन्य विभागों से मिलने वाली योजनाओं का लाभ भी मिलेगा। प्रसूति सहायता योजना यदि कोई महिला श्रम कल्याण विभाग में श्रमिक के रूप में पंजीकृत है तो उसके प्रथम प्रसव में लड़का होने पर 20 हजार रुपये तथा लड़की होने पर 21 हजार रुपये श्रम कल्याण विभाग द्वारा दिये जाते हैं। पुत्री के जन्म के समय माता की आयु कम से कम 20 वर्ष होनी चाहिये तथा पुत्री का जन्म किसी चिकित्सा संस्थान में होना चाहिये (घर पर नहीं)। कोई भी श्रमिक महिला प्रथम दो प्रसवों पर अर्थात् जीवन में कुल दो बार यह सहायता राशि प्राप्त कर सकती है। इसके लिये श्रम कल्याण विभाग में आवेदन करना होता है। विवाह सहायता योजना यदि कोई महिला श्रम कल्याण विभाग में निर्माण श्रमिक के रूप में पंजीकृत है तो वह अपनी दो पुत्रियों के विवाह के लिये 55-55 हजार रुपये की आर्थिक सहायता, उस पुत्री के 18 साल अथवा उससे अधिक आयु होने पर श्रम विभाग से ले सकती है। इसके लिये 18 साल पूरे करने वाली लड़की का आठवीं पास होना जरूरी है। आसान है श्रमिक के रूप में पंजीयन करवाना जो स्त्री या पुरुष साल भर में किसी संस्थान में, किसी के घर पर या किसी ठेकेदार के पास कम से कम 100 दिन तक निर्माण श्रमिक के रूप में मजदूरी करते हैं, वे अपना पंजीयन श्रम कल्याण विभाग में आसानी से करवा सकते हैं। पांच साल के पंजीयन के लिये 85 रुपये पंजीयन शुल्क लगता है।

साइकिल से पहुंचे मंत्री पद का शपथ लेने मनसुख मांडविया




नई दिल्ली, 5 जुलाई. गुजरात से राज्यसभा सांसद मनसुख एल. मांडविया नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री के तौर पर शपथ लेने राष्ट्रपति भवन पहुंचे. उन्होंने विशंभर दास मार्ग स्थित स्वर्ण जयंती सदन के अपने आवास से राष्ट्रपति भवन साइकिल पर सवार होकर पहुंचे. इस अनूठी पहल के बारे में उन्होंने बताया कि ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं ताकि लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़े और न सिर्फ आम लोग बल्कि खास कहे जाने वाले लोग भी ऐसी जीवनशैली अपनाएं जो पर्यावरण के अनुकूल हो.

साइकिल से शपथ लेने जाने के बारे में उन्होंने कहा, ‘साइकिल न तो मेरे लिए फैशन का विषय है और न ही यह मेरी मजबूरी है. बल्कि साइकिल मेरा पैशन है.’ यह पूछे जाने पर कि क्या वे मंत्रालय से संबंधित सभी यात्राओं में साइकिल का ही इस्तेमाल करेंगेउन्होंने कहा, ‘यह काम की प्रकृति पर निर्भर करेगा. जहां साइकिल का इस्तेमाल कर सकते हैंवहां करेंगे. लेकिन अगर कहीं गाड़ी से जाने से काम में तेजी आती हो तो मुझे उससे भी परहेज नहीं है.

मनसुख मांडविया ने कहा, ‘पर्यावरण की बिगड़ती सेहत को लेकर पूरे विश्व में चिंता की लहर है. हर तरफ पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने की बात हो रही है. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अक्सर अपने संबोधनों में इस तरह की अपील लोगों से करते रहते हैं. ऐसे में यह वक्त की जरूरत है कि प्रकृति की सेहत को सुधारने के लिए हम सिर्फ साइकिल ही नहीं बल्कि वैसी दूसरी चीजों को भी अपनाएं जिससे पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में मदद मिले.

गुजरात भाजपा के महासचिव मांडविया ने अपनी नई जिम्मेदारी के बारे में कहा, ‘यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे नरेंद्र मोदी जैसे दूरदर्शी और प्रेरक नेता के नेतृत्व में देश की सेवा करने का मौका मिला है. उनके नेतृत्व में जिस तरह के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक बदलाव की बयार बही हैहम उसे अपने सामथ्र्य के मुताबिक आगे बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे.

मंत्री पद की शपथ लेने जाने से पहले उन्होंने बताया कि तकरीबन दो साल पहले उन्होंने भाजपा के ही एक और राज्यसभा सदस्य अर्जुन मेघवाल के साथ मिलकर पर्यावरण सांसद क्लब की शुरुआत की थी. अब इस क्लब में 22 सांसद हैं. एक रोचक बात यह है कि मोदी सरकार के इस मंत्रिमंडल विस्तार में इस क्लब के चार सदस्य मंत्री बने हैं. इनमें एक तो मनसुख मांडविया हैं और उनके अलावा अर्जुन मेघवालकृष्णा राज और अनिल माधव दवे भी मंत्री बने हैं. मनसुख मांडविया ने कहा कि वे उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में और भी सांसद उनकी पहल के साथ जुड़ेंगे.

नोटः गठजोड़ को प्राप्त उक्त प्रेस नोट के सम्बन्ध में किसी भी अतिरिक्त जानकारी के लिए आप संपर्क कर सकते हैं श्री हरपाल सिंह से 9891241290 पर.