राजस्थान विधानसभा में दिनांक 26 अप्रेल 2017 को विधानसभा के सदस्यों, पूर्व सदस्यों एवं मंत्रियों के वेतन - भत्ते बढाने सम्बन्धी विधेयक पारित किया गया| राजस्थान सरकार के इस निर्णय से इन सदस्यों एवं मंत्रियों के 10 से 20 हजार तक वेतन बढ़ गए हैं, वहीं भत्ते एवं सुविधाओं पर भी व्यय बढ़कर सरकार या जनता पर बड़ा वित्तीय भार बढ़ गया है|
इस प्रकार के निर्णयों में कोई भी पार्टी की सरकार हो, चाहे वह केंद्र में हो या प्रदेश में, किसी वर्ग या समाज के लिए लोक लुभावनी घोषणाएं करती रहती है| ऐसा कब तक चलेगा ? किसी भी वर्ग के लिए सरकार पर बड़ा वित्तीय भार डालकर ऐसे निर्णयों के पीछे कोई बहुत बड़ा औचित्य पूर्ण दृष्टिकोण सबके सामने स्पष्ट होना चाहिए, जनता के सामने यह कारण आना चाहिए कि इसके पीछे क्या कारण है, इसकी ठोस वजह क्या है| मात्र सदन में बहुमत होने से कोई भी पार्टी जब चाहे इस प्रकार का बड़ा निर्णय ले ले, यह अत्यंत अनुचित है|
मजेदार बात ये है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई भी पार्टी की सरकार अपने समय में किसी वर्ग या समाज के हित में इस प्रकार के निर्णय ले लेती है, किन्तु दूसरी ओर विपक्षी पार्टी उस सम्बंधित वर्ग या समाज के लिए, लिए गए ऐसे निर्णय का विरोध भी नहीं कर पाती है, क्योंकि इससे उसके वोट बैंक का नुकसान होगा| इस प्रकार बहुत बार अनावश्यक सुविधाएं या अत्यंत लाभ देने वाले निर्णय बिना किसी बहस या विरोध के आसानी से पारित हो जाते हैं| अभी तक तो बहुत मामलों में ऐसा ही हो रहा है| ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि ये सब रुकेगा कैसे ? मेरा आशय सभी लोक लुभावने निर्णयों से न लिया जावे, कई बार जिन्हें हम लोक लुभावना निर्णय या घोषणा समझें, हो सकता है वह सही ही हो और वास्तव में उसकी जरूरत भी हो| अपना दृष्टिकोण उसे न देख पा रहा हो, यह भी संभव है|
सत्तासीन पार्टी का मुखिया सत्ता संभालते समय शपथ लेता है कि वह बिना किसी जाति एवं भेदभाव के न्याय पूर्ण ढंग से हर व्यक्ति, वर्ग या समाज के हित में निर्णय लेगा, राष्ट्र एवं प्रदेश हित में पूरी निष्पक्षता से शासन चलाएगा, किन्तु दु:खद तथ्य है कि कोई भी इसमें खरा नहीं उतर रहा है| आमजन को कोई भी पार्टी लम्बे समय तक संतुष्ट नहीं रख पा रही है और प्राय: कर अभी तक एक पार्टी के शासन के बाद दूसरी विपक्षी पार्टी को वोट देकर एक बार फिर आश लगा बैठती है या ज्यादा असंतुष्ट होने पर दूसरी विपक्षी पार्टी के हित वोट देकर सत्तासीन पार्टी के खिलाफ रोष निकाल देती है|
वोट बैंक बनाने की होड़ में सत्तासीन पार्टी ये बड़ी भूल कर रही है कि वे जिस लोक लुभावने निर्णय से किसी वर्ग, समाज या धर्म के लोगों में अपनी पकड़ करना चाहती है तो ऐसा करके वो उससे दूसरे किसी विपरीत वर्ग के वोटों से हाथ भी धो बैठती है| मेरे विचार से वह समाज या वर्ग भी यह जानता है कि उसके हित में यह बिना ओचित्य के बड़ी भारी सुविधा देने वाला निर्णय वोटों की राजनीति के तहत लिया जा रहा है, अत: जरुरी नहीं कि वह वर्ग या समाज भी उसको पूर्ण रूपेण संख्या में वोट दे ही दे और उस पार्टी का वोट बैंक मजबूत हो जावे| आमजन सब कुछ देखते रहते हैं और वे हर घटना या घोषणा को याद रखते हैं और चुनाव आने पर उस परिपेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए वोट देकर सत्ता बदल देते हैं| अत: आवश्यकता इस बात कि है कि कोई भी पार्टी की सरकार हो, चाहे वह केंद्र में हो या प्रदेश में, जब भी किसी वर्ग, समाज या धर्म के लिए लुभाने जैसी घोषणा करे तो वो ही निर्णय ले, जिसमें पूरी निष्पक्षता झलके, ईमानदारी दिखे, अर्थात निर्णय की ठोस वजह जनता को बतलाई जा सकनी संभव हो या जिसका औचित्य सिद्ध किया जा सके, केवल ऐसी ही घोषणाएं करे|
ताजा उदाहरण हमारे सामने है, दिल्ली नगर निगम के चुनाव, वहां के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव से पूर्व कितनी लोक लुभावनी (सरकार पर वित्तीय भार बढाने वाली) घोषणाएं की थी, और निर्णय क्या हुआ, सबके सामने है|
इस प्रकार के निर्णयों में कोई भी पार्टी की सरकार हो, चाहे वह केंद्र में हो या प्रदेश में, किसी वर्ग या समाज के लिए लोक लुभावनी घोषणाएं करती रहती है| ऐसा कब तक चलेगा ? किसी भी वर्ग के लिए सरकार पर बड़ा वित्तीय भार डालकर ऐसे निर्णयों के पीछे कोई बहुत बड़ा औचित्य पूर्ण दृष्टिकोण सबके सामने स्पष्ट होना चाहिए, जनता के सामने यह कारण आना चाहिए कि इसके पीछे क्या कारण है, इसकी ठोस वजह क्या है| मात्र सदन में बहुमत होने से कोई भी पार्टी जब चाहे इस प्रकार का बड़ा निर्णय ले ले, यह अत्यंत अनुचित है|
मजेदार बात ये है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई भी पार्टी की सरकार अपने समय में किसी वर्ग या समाज के हित में इस प्रकार के निर्णय ले लेती है, किन्तु दूसरी ओर विपक्षी पार्टी उस सम्बंधित वर्ग या समाज के लिए, लिए गए ऐसे निर्णय का विरोध भी नहीं कर पाती है, क्योंकि इससे उसके वोट बैंक का नुकसान होगा| इस प्रकार बहुत बार अनावश्यक सुविधाएं या अत्यंत लाभ देने वाले निर्णय बिना किसी बहस या विरोध के आसानी से पारित हो जाते हैं| अभी तक तो बहुत मामलों में ऐसा ही हो रहा है| ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि ये सब रुकेगा कैसे ? मेरा आशय सभी लोक लुभावने निर्णयों से न लिया जावे, कई बार जिन्हें हम लोक लुभावना निर्णय या घोषणा समझें, हो सकता है वह सही ही हो और वास्तव में उसकी जरूरत भी हो| अपना दृष्टिकोण उसे न देख पा रहा हो, यह भी संभव है|
सत्तासीन पार्टी का मुखिया सत्ता संभालते समय शपथ लेता है कि वह बिना किसी जाति एवं भेदभाव के न्याय पूर्ण ढंग से हर व्यक्ति, वर्ग या समाज के हित में निर्णय लेगा, राष्ट्र एवं प्रदेश हित में पूरी निष्पक्षता से शासन चलाएगा, किन्तु दु:खद तथ्य है कि कोई भी इसमें खरा नहीं उतर रहा है| आमजन को कोई भी पार्टी लम्बे समय तक संतुष्ट नहीं रख पा रही है और प्राय: कर अभी तक एक पार्टी के शासन के बाद दूसरी विपक्षी पार्टी को वोट देकर एक बार फिर आश लगा बैठती है या ज्यादा असंतुष्ट होने पर दूसरी विपक्षी पार्टी के हित वोट देकर सत्तासीन पार्टी के खिलाफ रोष निकाल देती है|
वोट बैंक बनाने की होड़ में सत्तासीन पार्टी ये बड़ी भूल कर रही है कि वे जिस लोक लुभावने निर्णय से किसी वर्ग, समाज या धर्म के लोगों में अपनी पकड़ करना चाहती है तो ऐसा करके वो उससे दूसरे किसी विपरीत वर्ग के वोटों से हाथ भी धो बैठती है| मेरे विचार से वह समाज या वर्ग भी यह जानता है कि उसके हित में यह बिना ओचित्य के बड़ी भारी सुविधा देने वाला निर्णय वोटों की राजनीति के तहत लिया जा रहा है, अत: जरुरी नहीं कि वह वर्ग या समाज भी उसको पूर्ण रूपेण संख्या में वोट दे ही दे और उस पार्टी का वोट बैंक मजबूत हो जावे| आमजन सब कुछ देखते रहते हैं और वे हर घटना या घोषणा को याद रखते हैं और चुनाव आने पर उस परिपेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए वोट देकर सत्ता बदल देते हैं| अत: आवश्यकता इस बात कि है कि कोई भी पार्टी की सरकार हो, चाहे वह केंद्र में हो या प्रदेश में, जब भी किसी वर्ग, समाज या धर्म के लिए लुभाने जैसी घोषणा करे तो वो ही निर्णय ले, जिसमें पूरी निष्पक्षता झलके, ईमानदारी दिखे, अर्थात निर्णय की ठोस वजह जनता को बतलाई जा सकनी संभव हो या जिसका औचित्य सिद्ध किया जा सके, केवल ऐसी ही घोषणाएं करे|
ताजा उदाहरण हमारे सामने है, दिल्ली नगर निगम के चुनाव, वहां के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव से पूर्व कितनी लोक लुभावनी (सरकार पर वित्तीय भार बढाने वाली) घोषणाएं की थी, और निर्णय क्या हुआ, सबके सामने है|
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